Wednesday, 29 July 2009
Wednesday, 5 November 2008
रत्न विज्ञान
एक ही राशि के संसार में जितने भी व्यक्ति हैं, वे बच्चे कुमार,युवा एवं वृद्ध तथा स्त्री या पुरूष ही क्यों न हो सबके ग्रहों की स्थिति एक ही प्रकार की नहीं होती। एक ही राशि के प्रत्येक व्यक्ति की ग्रहों की स्थिति के अनुसार उन व्यक्तियों की स्थिति एवं परिस्थितियों में भिन्नता होती हैं। एक ही राशि के सभी व्यक्तियों के लिए शनि ढइया हो या साड़ेसाती हो, खराब नहीं होती। किसी के लिए खराब होती है, तो किसी के लिए मध्यम खराब होती है, तो किसी के लिए बहुत खराब होती हैं, ठीक इसी प्रकार किसी के लिए थोड़ी ठीक होती है, तो किसी के लिए मध्यम ठीक होती है, तो किसी के लिए बहुत ठीक होती है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह को लिया गया है क्योंकि जब किसी पर कष्ट आता है तब उसे ऐसा महसूस होता है कि उसे शनि ही परेशान कर रहा है क्योंकि शनि के प्रति इस प्रकार की धारण आम व्यक्ति के मन में बनी है, जबकि ऐसा नहीं है। शनि ग्रह देने वालों को क्या-क्या नहीं देते दुनिया के सुख ठाट-बाट, राजपाट आदि शान शौहरत व्यवसाय एवं उद्योग आदि सभी देते हैं। इतना सब कुछ देने के बाद भी शनि के प्रति अच्छी धारणा अधिकतर व्यक्तियों के मन में नहीं होती। शनि का नाम बदनाम की श्रेणी में अधिक है,जो कि अनुचित है। शनि के अलावा अन्य कुछ ग्रह और भी हैं जो मनुष्य को अनेकों प्रकार के कष्ट या अनेकों प्रकार की सुख संपदा दे सकते हैं।
जिनकी कुण्डली है उसमें इन सभी की स्थिति भली-भांति देखी जा सकती है जिनकी कण्डली नहीं है उनकी हस्तरेखा से भी ग्रहों की स्थिति देखी जा सकती है और एकदम सहीं स्थिति दिव्य रूद्राक्ष से जांच करके देखी जा सकती है। दिव्य रूद्राक्ष द्वारा जांच दुर्लभ जैसी है।
अत: एक ही राशि के व्यक्ति के लिए की गई आम घोषणा या व्यापारिक विज्ञापन या फलित राशि फल के अनुसार रत्न को धारण करना अनुचित होगा। रत्न धारण के पूर्व विद्ववानों से परामर्श लेकर ही रत्न धारण करना चाहिए। जिस व्यक्ति की कुण्डली नहीं हैं, उन्हें तो विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए। हर किसी के कह देने से कोई रत्न धारण नहीं करना चाहिए। हमारा कहना है कि धारक अपनी सुझ-बुझ से ही समझ कर यदि रत्न धारण करें तो ही उचित फल प्राप्त कर सकता है नहीं तो करोड़पति के बजाए रोड़पति भी बन सकता है, एक ही राशि के कई व्यक्तियों की एक ही दिन में या एक सप्ताह में दिव्य रूद्राक्ष द्वारा जांच की गई और उन्हें अलग-अलग रत्न धारण कराये गये और परिणाम स्वरूप सभी के रिजल्ट पाजेटिव प्राप्त हुयें। यह जांच प्रेक्टिकल हैं, कोई मनगढ़त कहानी नहीं है। इस जांच के माध्यम से धारण कराये गये रत्नों का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता यह ९९ प्रतिशत सफल जांच है तथा परिणाम भी सफल है।
आनंद शाण्डिल्य
जिनकी कुण्डली है उसमें इन सभी की स्थिति भली-भांति देखी जा सकती है जिनकी कण्डली नहीं है उनकी हस्तरेखा से भी ग्रहों की स्थिति देखी जा सकती है और एकदम सहीं स्थिति दिव्य रूद्राक्ष से जांच करके देखी जा सकती है। दिव्य रूद्राक्ष द्वारा जांच दुर्लभ जैसी है।
अत: एक ही राशि के व्यक्ति के लिए की गई आम घोषणा या व्यापारिक विज्ञापन या फलित राशि फल के अनुसार रत्न को धारण करना अनुचित होगा। रत्न धारण के पूर्व विद्ववानों से परामर्श लेकर ही रत्न धारण करना चाहिए। जिस व्यक्ति की कुण्डली नहीं हैं, उन्हें तो विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए। हर किसी के कह देने से कोई रत्न धारण नहीं करना चाहिए। हमारा कहना है कि धारक अपनी सुझ-बुझ से ही समझ कर यदि रत्न धारण करें तो ही उचित फल प्राप्त कर सकता है नहीं तो करोड़पति के बजाए रोड़पति भी बन सकता है, एक ही राशि के कई व्यक्तियों की एक ही दिन में या एक सप्ताह में दिव्य रूद्राक्ष द्वारा जांच की गई और उन्हें अलग-अलग रत्न धारण कराये गये और परिणाम स्वरूप सभी के रिजल्ट पाजेटिव प्राप्त हुयें। यह जांच प्रेक्टिकल हैं, कोई मनगढ़त कहानी नहीं है। इस जांच के माध्यम से धारण कराये गये रत्नों का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता यह ९९ प्रतिशत सफल जांच है तथा परिणाम भी सफल है।
आनंद शाण्डिल्य
ध्यान और तंत्र
यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः स्मृतः।
उभयोरन्तरं नास्ति गुरोरपि शिवस्य च।।
यतो न वेदा मनसा सहैनमनप्रविशन्ति ततोऽथमौनम्।
यत्रोत्थितो वेदशब्दस्तथायं स तन्मयत्वेन विभाति राजन।
योगसन, स्वच्छता, स्नानादि से शरीर पुष्ट एवं शुद्ध होता है। यद्यपि उनका ध्यान-क्रिया से कोई सीधा संबंध नहीं है, तथापि उनका एक महत्व है। यम, नियम का पालन करने पर आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार को अभ्यास करने पर धारणा की अवस्था प्राप्त होती है। धारणा ध्यान की पूर्वावस्था है और ध्यान का परिपाक समाधि है। (समाधि की विभिन्न प्रक्रियाएं, आत्मा का प्रक्षेपण इत्यादि, सिद्ध गुरु के निर्देशन में ही करना चाहिए . ध्यान कोई तन्त्र-मन्त्र नहीं है। मन को बाहर से भीतर की ओर ले जाना और उसे विचारों के स्रोत्र से मुक्त कर देना ही 'ध्यान' हैं। ध्यान मन की एकाग्रता नहीं है, बल्कि मन को भीतरी चेतना के साथ जोड़ना है। ध्यान एक साधना है, जिसके द्वारा हम अपने भीतर आत्मानन्द उपजाते हैं। केसर सब स्थानों पर उत्पन्न नहीं होता है; उसके लिए उपयुक्त स्थान खोजना होता है तथा एक विशेष पद्धति अपनाकर अथक परिश्रम करना होता है। हमें आत्मानंद उपजाने के लिए भी प्रयत्न (साधना) करना होगा। ध्यान-साधना आत्मानन्द-प्राप्ति का एक साधन है। ध्यान सम्पूर्ण मन के मौन के द्वारा उस अवस्थान्तर प्राप्त होने का साधना है, जो बुद्धि-ग्राह्य नहीं है। ध्यान के द्वारा मन अपने संचित ज्ञान एवं अनुभव से अथवा बौद्धिक स्तर से ऊपर उठ जाता है। यह स्थिति कोई रिक्तता अथवा शून्यता नहींहै, बल्कि बुद्धि के व्यापार से मुक्त होकर उस से परे सूक्ष्म चेतना के सागर में प्रवाहित होना है, जो कि स्थूल जगत् के परे है। ब्रह्मसूत्र में "ध्यानाच्च" का भाष्य करते हुए शंकर कहते हैं कि एक प्रत्यय करना ही ध्यान होता है।आध्यात्मिक भूमिका में यह प्रवाह परमानन्द का प्रवाह है।
डॉ दीनदयाल मणि त्रिपाठी
उभयोरन्तरं नास्ति गुरोरपि शिवस्य च।।
यतो न वेदा मनसा सहैनमनप्रविशन्ति ततोऽथमौनम्।
यत्रोत्थितो वेदशब्दस्तथायं स तन्मयत्वेन विभाति राजन।
योगसन, स्वच्छता, स्नानादि से शरीर पुष्ट एवं शुद्ध होता है। यद्यपि उनका ध्यान-क्रिया से कोई सीधा संबंध नहीं है, तथापि उनका एक महत्व है। यम, नियम का पालन करने पर आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार को अभ्यास करने पर धारणा की अवस्था प्राप्त होती है। धारणा ध्यान की पूर्वावस्था है और ध्यान का परिपाक समाधि है। (समाधि की विभिन्न प्रक्रियाएं, आत्मा का प्रक्षेपण इत्यादि, सिद्ध गुरु के निर्देशन में ही करना चाहिए . ध्यान कोई तन्त्र-मन्त्र नहीं है। मन को बाहर से भीतर की ओर ले जाना और उसे विचारों के स्रोत्र से मुक्त कर देना ही 'ध्यान' हैं। ध्यान मन की एकाग्रता नहीं है, बल्कि मन को भीतरी चेतना के साथ जोड़ना है। ध्यान एक साधना है, जिसके द्वारा हम अपने भीतर आत्मानन्द उपजाते हैं। केसर सब स्थानों पर उत्पन्न नहीं होता है; उसके लिए उपयुक्त स्थान खोजना होता है तथा एक विशेष पद्धति अपनाकर अथक परिश्रम करना होता है। हमें आत्मानंद उपजाने के लिए भी प्रयत्न (साधना) करना होगा। ध्यान-साधना आत्मानन्द-प्राप्ति का एक साधन है। ध्यान सम्पूर्ण मन के मौन के द्वारा उस अवस्थान्तर प्राप्त होने का साधना है, जो बुद्धि-ग्राह्य नहीं है। ध्यान के द्वारा मन अपने संचित ज्ञान एवं अनुभव से अथवा बौद्धिक स्तर से ऊपर उठ जाता है। यह स्थिति कोई रिक्तता अथवा शून्यता नहींहै, बल्कि बुद्धि के व्यापार से मुक्त होकर उस से परे सूक्ष्म चेतना के सागर में प्रवाहित होना है, जो कि स्थूल जगत् के परे है। ब्रह्मसूत्र में "ध्यानाच्च" का भाष्य करते हुए शंकर कहते हैं कि एक प्रत्यय करना ही ध्यान होता है।आध्यात्मिक भूमिका में यह प्रवाह परमानन्द का प्रवाह है।
डॉ दीनदयाल मणि त्रिपाठी
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